Hindi Poems for Kids

बच्चों की हिन्दी कविताएं — पिटारा का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children

मुखौटे

श्याम बनेगा शेरू अपना गीत बनेगा बन्दर शिल्पा बिल्ली दूध पीएगी बैठी घर के अन्दर बबलू भौं भौं करता पल पल धूम मचाएगा। मोटू अपना हाथी बनकर झूमे सूंड हिलाएगा होगी फिर इन सबकी मस्ती गाती होगी बस्ती खुश होगा हर एक जानवर खुशियां कितनी सस्ती हा हा ही ही मैं भी मैं भी लगा मुखौटा गाऊं तुम...

चिड़ियाघर

चिड़ियाघर भई, चिड़ियाघर इसके अंदर है बंदर। पानी वाला बड़ा मगर। बारहसिंघे का ये घर। चिड़ियाघर भई, चिड़ियाघर।कविता 15 हक्का बक्का : बच्चों के लिए 15 हिन्दी कविता Hindi poem for children first published by National Book Trust

रेलगाड़ी

आओ बच्चों रेल दिखायें छुक छुक करती रेल चलायें सीटी देकर सीट पे बैठो एक दूजे की पीठ पे बैठो आगे पीछे, पीछे आगे लाइन से लेकिन कोई न भागे सारे सीधी लाइन में चलना आंखे दोनों नीची रखना बंद आंखों से देखा जाए आंख खुली तो कुछ न पाए आओ बच्चों रेल चलायें सुनो...

किताबे

किताबे करती हैं बातें बीते ज़मानों की दुनियां की इंसानों की आज की कल की एक एक पल की खुशियों की ग़मों की फूलों की बमों की जीत की हार की प्यार की मार की क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों की बातें किताबें कुछ कहना चाहती हैं तुम्हारे पास रहना चाहती है किताबों में चिड़ियां चहचहाती...

चंपा

मोर बोला, चंपा, चंपा, तू अपने चंपा को कपड़े क्यों नहीं पहनाती तू भी अजीब है पोलीएस्टर और नायलोन डेकोन और टेरीकोट, मुझे समझाती है तूने शायद मेरा रूप नहीं देखा, अरे हां, तूने अपना रूप देखा ही कहां है ड्रेस के नीचे अपना सूंदर पेट कभी देखा है अपने मोजों के भीतर का पैर कभी देखा है, नहीं,...

नानी की नाव

नाव चली नाव चली नानी की नाव चली नीना की नानी की नाव चली लम्बे सफर पे सामान घर से निकाले गए नानी के घर से निकाले गए और नानी की नाव में डाले गए क्या क्या डाले गए एक छड़ी, एक घड़ी एक झाड़ू, एक लाड़ू एक सन्दूक, एक बन्दूक एक सलवार, एक तलवार एक घोड़े...

पेड़

आओ इस जंगल में आओ मत घबराओ मैं इस जंगल का एक पेड़ तुम्हें बुलाता हूं अपनी कथा सुनाता हूं आओ अपने साथियों से मिलवाता हूं आओ, छूकर देखो मेरा तना सीधा और मज़बूत और ऊपर मेरी पतली बल खाती शाखों को देखो देखो अनगिनत टहनियों को क्या पूछते हो मेरे दोस्त वो तो पिछले पतझड़ में गिर...

बन्दर मामा

एक पेड़ पर नदी किनारे, बन्दर मामा रहते थे। वर्षा गर्मी सर्दी उसी पेड़ पर रहते थे। भूख मिटाने को बगिया से चुन चुन फल खाया करते। य़ा छीन झपट बच्चों से ये चीजें ले आया करते। खा पी सेठ हुए मामा जी, झूम झूम इठलाते थे। और नदी के मगर मौसिया देख देख ललचाते...

अमरूद बन गये

आमों के अमरूद बन गये अमरूदों के केले मैंने यह सब कुछ देखा है आज गया था मेले बकरी थी बिलकुल छोटी सी हाथी की थी बोली मगर जुखाम नहीं सह पाई खाई उसने गोली छत पर होती थी खों खों खों मगर नहीं था बंदर बिल्ली ही यों बोल रही थी परसो मेरी छत...

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